History of Ram Mandir

9 नवंबर 2019 को भारत के कानूनी इतिहास में सबसे लंबे समय तक चलने वाली लड़ाइयों में से एक का समापन हो गया। 134 साल पहले अयोध्या टाइटल विवाद में पहला मामला दायर किया गया था। दशकों से यह कानूनी लड़ाई जारी थी। फैजाबाद सिविल कोर्ट से शुरू होकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच और सुप्रीम कोर्ट तक।

इस मामले के कुछ महत्वपूर्ण मील के पत्थर भी हैं, राम जन्मभूमि आंदोलन के रूप में आधुनिक भारत में सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रम में से एक का जन्म भी देखा। यहाँ पर आपको राम मंदिर – बाबरी मस्जिद विवाद का इतिहास के साथ कोर्ट की सुनवाई की पूरी टाइमलाइन की जानकारी दी गई है।

आजादी से पहले अयोध्या विवाद का इतिहास – Ayodhya Case History before Independence

अयोध्या विवाद में पहला दर्ज कानूनी इतिहास 1858 का है। निहंग सिखों के एक समूह के खिलाफ 30 नवंबर 1858 को एक प्राथमिकी दर्ज की गई थी। जिन्होंने बाबरी मस्जिद के अंदर अपनी निशानी और राम लिखा था। उन्होंने मस्जिद में हवन और पूजा भी की थी। अवध के थानेदार शीतल दुबे ने 1 दिसंबर, 1858 को अपनी रिपोर्ट में शिकायत का सत्यापन किया और यहां तक कहा कि सिखों द्वारा एक चबूतरा का निर्माण किया गया था। अयोध्या विवाद में यह पहला दस्तावेजी प्रमाण है।

अयोध्या विवाद 1528 ईस्वी से 1949 तक कब क्या हुआ

  • मुगल शासक बाबर के कमांडर मीर बाक़ी ने वर्ष 1528 ईस्वी में बाबरी मस्जिद का निर्माण किया था
  • 9 नवंबर 1885 को महंत रघुवर दास ने फ़ैज़ाबाद ज़िला कोर्ट में याचिका दायर करके राम जन्मभूमि स्थल (जो की बाबरी मस्जिद के अंदर था) पर राम मंदिर निर्माण की अनुमति माँगी थी। हालाँकि कोर्ट ने इस याचिका को ख़ारिज कर दिया था।
  • 1949 में कुछ अज्ञात लोगों ने बाबरी मस्जिद के अंदर राम की मूर्ति रख दी इसके बाद अयोध्या का यह विवाद और बढ़ गया। तब सरकार ने इस स्थल को सीज कर दिया।

अयोध्या विवाद की कानूनी लड़ाई 1885 में शुरू हुई, जब महंत रघुबर दास ने फैजाबाद की दीवानी अदालत में भारत के राज्य सचिव के खिलाफ मुकदमा दायर किया (नं 61/280)। अपने सूट में, दास ने दावा किया कि यह स्थल राम की जन्मभूमि है और यहाँ पर उन्हें मंदिर बनाने की अनुमति दी जानी चाहिए। हालाँकि कोर्ट ने मुकदमा खारिज कर दिया गया था। 1885 के फैसले के खिलाफ 1886 में एक सिविल अपील (संख्या 27) दायर की गई थी। फैजाबाद के जिला न्यायाधीश, एफईआर चामियर ने आदेश पारित करने से पहले घटनास्थल का दौरा करने का फैसला किया। बाद में उन्होंने अपील खारिज कर दी।

1950 से 1961 तक का अयोध्या विवाद का इतिहास

  • 1950 में गोपाल दास विसारद और परमहंस राम चन्द्र दास ने बाबरी मस्जिद की जगह पर मूर्ति पूजा करने के लिए फ़ैज़ाबाद कोर्ट में केस दायर किया।
  • 1959 में निर्मोही अखाड़ा ने विवादित भूमि के स्वामित्व अपने नाम करने के लिए केस फ़ाइल किया।
  • 1961 में उत्तर प्रदेश के सुन्नी वक्फ़ बोर्ड ने विवादित भूमि के मालिकाना हक़ के लिए केस फ़ाइल किया।

अयोध्या विवाद में पहले दायर की गई याचिका की बर्खास्तगी के खिलाफ एक दूसरा सिविल अपील (नंबर 122) दायर किया गया था, जिसे न्यायिक आयुक्त की अदालत ने भी खारिज कर दिया था। इसके बाद अगले 63 वर्षों तक, मामले में कोई कानूनी प्रगति नहीं हुई। 1934 में, अयोध्या में एक दंगा हुआ और हिंदुओं ने विवादित स्थल की संरचना के एक हिस्से को ध्वस्त कर दिया। ध्वस्त किए गए इस हिस्से का पुनर्निर्माण अंग्रेजों ने करवाया था।

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राम की मूर्ति प्रकट हुई और अयोध्या विवाद बढ़ गया

1949 की 22 और 23 दिसंबर की मध्यरात्रि में, मस्जिद के केंद्रीय गुंबद के अंदर मूर्तियाँ मिलीं। तब फैजाबाद के डीएम केके नायर ने 23 दिसंबर की सुबह यूपी के मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत को हिंदुओं के एक समूह के उस स्थल पर प्रवेश करने की जानकारी दी। मामले में प्राथमिकी दर्ज की गई और उसी दिन गेट बंद कर दिए गए। 29 दिसंबर को, सिटी मजिस्ट्रेट ने पूरी संपत्ति को संलग्न करने के लिए धारा 145 सीआरपीसी के तहत एक आदेश पारित किया और नगर महापालिका अध्यक्ष प्रिया दत्त राम को रिसीवर नियुक्त किया। एक हफ्ते बाद 5 जनवरी 1950 को प्रिया दत्त राम ने रिसीवर के रूप में कार्यभार संभाला।

वर्तमान अयोध्या विवाद की नींव कैसे पड़ी – Ayodhya Case Timeline

  • 16 जनवरी 1950 को हिंदू महासभा के गोपाल सिंह विशारद इस मामले में स्वतंत्र भारत में मुकदमा दायर करने वाले पहले व्यक्ति बने। गोपाल विशारद ने पांच मुसलमानों, राज्य सरकार और फैजाबाद के जिला मजिस्ट्रेट के खिलाफ मुकदमा दायर किया और पूजा का अधिकार माँगा। इसके बाद सिविल जज ने आदेश पारित करके बाबरी मस्जिद के आंतरिक आंगन में पूजा की अनुमति दी।
  • 25 मई को जहूर अहमद और अन्य लोगों के खिलाफ परमहंस रामचंद्र दास द्वारा दूसरा मुकदमा दायर किया गया था और यह पहले सूट के समान था।
  • नौ साल बाद 17 दिसंबर 1959 को निर्मोही अखाडा ने रिसीवर से संपत्ति का प्रबंधन संभालने के लिए तीसरा मुकदमा दायर किया।
  • दो साल बाद 18 दिसंबर 1961 को सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने (उन सभी प्रतिवादियों के साथ जिनका नाम पहले के मुकदमों में था) फैजाबाद की अदालत में चौथा मुकदमा दायर किया और बाबरी मस्जिद से मूर्तियों को हटाने और मस्जिद पर अपने मालिकाना हक की माँग की।
  • 20 मार्च 1963 को अदालत ने कहा कि संपूर्ण हिंदू समुदाय का प्रतिनिधित्व कुछ व्यक्तियों द्वारा नहीं किया जा सकता है। इसने हिंदू समुदाय, आर्य समाज और सनातन धर्म सभा को हिंदू समुदाय का प्रतिनिधित्व करने के लिए प्रतिवादी के रूप में पेश करने के लिए सार्वजनिक नोटिस का आदेश दिया।
  • 1 जुलाई 1989 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश देवकी नंदन अग्रवाल द्वारा राम लला विराजमान के रूप में पाँचवाँ मुकदमा फैज़ाबाद में सिविल जज के समक्ष दायर किया गया था। इसमें आग्रह किया गया कि नए मंदिर के निर्माण के लिए पूरी जगह राम लला को सौंप दी जाए।
  • 1989 में शिया वक्फ बोर्ड ने भी मुकदमा दायर किया और मामले में प्रतिवादी बन गया।
  • 25 जनवरी 1986 को एक वकील उमेश चंद्र पांडे ने मुंसिफ मजिस्ट्रेट फैजाबाद के पास एक आवेदन दायर किया, इसमें आग्रह किया गया कि विवादित स्थल के ताले खोले जाएं और जो मूर्तियाँ अंदर मिली थीं लोगों को उनके दर्शन की अनुमति दी जाए। मुंसिफ मजिस्ट्रेट ने आवेदन को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि मामले से संबंधित फाइलें उच्च न्यायालय के समक्ष हैं। पांडे ने 31 जनवरी 1986 को फ़ैज़ाबाद जिला अदालत में आदेश की अपील की।

1986 से 1989 तक राम मंदिर अयोध्या विवाद का इतिहास

  • 1986 में फ़ैज़ाबाद की लोकल अदालत ने विवादित स्थल पर हिंदुओं को पूजा करने का अधिकार दिया।
  • 1989 में देवकी नंदन अग्रवाल (सेवानिवृत जज) ने राम लला विराजमान देवता के नाम से केस फ़ाइल किया।
  • 1 फरवरी 1986 को फ़ैज़ाबाद के डीएम और एसपी दोनों ने अदालत में स्वीकार किया कि ताले खोलने पर शांति बनाए रखने में कोई समस्या नहीं होगी। अदालत ने ताले खोलने का आदेश दिया और इसे उसी दिन खोला गया। यह अयोध्या विवाद का एक महत्वपूर्ण मोड़ था और इसने भारत के राजनीतिक घटनाक्रम को बदल दिया। ताले खोलने के बाद मुस्लिम नेता 6 फरवरी को लखनऊ में मिले और संयोजक के रूप में जफरयाब जिलानी के साथ एक बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी का गठन किया गया।
  • 12 जुलाई 1989 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक आदेश पारित करते हुए सभी मुकदमों को उच्च न्यायालय की तीन न्यायाधीशों की पीठ में स्थानांतरित कर दिया।
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1990 से 1992 तक अयोध्या विवाद का इतिहास

  • 1990 में भाजपा नेता लाल कृष्णा आडवाणी ने विवादित भूमि पर राम मंदिर निर्माण के लिए देश भर में यात्रा निकाली थी।
  • 7 और 10 अक्टूबर 1991 को उत्तर प्रदेश की भाजपा की राज्य सरकार ने भूमि अधिग्रहण अधिनियम के तहत पर्यटन उद्देश्य के लिए इसे विकसित करने के लिए विवादित स्थल के आस-पास के क्षेत्र (कुल 2.77 एकड़ भूमि) के साथ परिसर का अधिग्रहण किया।
  • इस अधिग्रहण को मुसलमानों ने छह रिट याचिकाओं के माध्यम से चुनौती दी थी। 11 दिसंबर 1992 को उच्च न्यायालय द्वारा अधिग्रहण को रद्द कर दिया गया था।
  • 6 दिसंबर 1992 को सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालय द्वारा अंतरिम आदेशों के बावजूद मस्जिद को ध्वस्त कर दिया गया था और भाजपा नेताओं सहित कई लोगों के खिलाफ 49 प्राथमिकी (विध्वंस का मामला) दर्ज की गई थीं।

बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद का राम मंदिर अयोध्या केस

  • 21 दिसंबर 1992 को हरि शंकर जैन ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ में एक याचिका दायर की, इस याचिका में कहा गया कि भगवान राम की पूजा करना उनका मौलिक अधिकार है।
  • 1 जनवरी 1993 को उच्च न्यायालय ने कहा कि प्रत्येक हिंदू को उस स्थान पर पूजा करने का अधिकार है जिसे भगवान राम की जन्मभूमि माना जाता है।

हालांकि आगे की परेशानी को भांपते हुए केंद्र सरकार ने 7 जनवरी 1993 को एक अध्यादेश – “Ayodhya Ordinance 1993 – the Acquisition of Central Area at Ayodhya” लाकर विवादित भूमि और इसके आसपास के क्षेत्रों सहित 67 एकड़ भूमि का अधिग्रहण किया। साथ ही केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को एक संदर्भ भेज कर यह निर्धारित करने के लिए कहा कि क्या बाबरी मस्जिद के निर्माण से पहले उस स्थान पर एक मंदिर था ?

  • सरकार द्वारा अधिग्रहण के तुरंत बाद मोहम्मद इस्माइल फारूकी ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर इसे चुनौती दी। SC ने याचिका सुनने के लिए पांच न्यायाधीशों वाली पीठ का गठन किया। 24 अक्टूबर 1994 को शीर्ष अदालत ने माना कि सरकार द्वारा किया गया भूमि अधिग्रहण वैध था।
  • 1993 में केंद्र सरकार ने अध्यादेश – “Ayodhya Ordinance 1993 – the Acquisition of Central Area at Ayodhya” लाकर विवादित स्थल के साथ उसके आसपास की 67 एकड़ भूमि का अधिग्रहण किया।
  • 1994 सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के भूमि अधिग्रहण को वैध बताया। साथ ही एक केस की सुनवाई में फैसला सुनाया की इस्लाम में मस्जिद जरुरी नही है और नमाज कहीं भी अदा की जा सकती है।
  • इलाहाबाद उच्च न्यायालय में राम मंदिर, अयोध्या विवाद का मामला आने के तेरह साल बाद मार्च 2002 में सुनवाई हुई।
  • जुलाई 2003 में, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने विवादित स्थल पर भारतीय पुरातत्व विभाग को खुदाई का आदेश दिया। ताकि मंदिर के सबूत जुटाए जा सकें।
  • भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने खुदाई की और 22 अगस्त, 2003 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। ASI ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि विवादित ढांचे के नीचे एक विशाल संरचना थी और हिंदू धर्म की कई मूर्तियाँ और कलाकृतियां थीं।
  • 2003 में सुप्रीम कोर्ट ने विवादित भूमि पर हर तरह के धार्मिक पूजा-पाठ पर रोक लगा दी। Archaeological Survey of India – ASI (भारतीय पुरातत्व विभाग) ने अपनी रिपोर्ट सबमिट करके बताया की खुदाई स्थल पर हिंदूओं मंदिर का पुराना ढाँचा मिला है। जिसमें कई मूर्तियाँ और पिलर शामिल हैं।
  • 2009 में Liberhan Commission ने अपनी रिपोर्ट जमा किया। इस रिपोर्ट में कहा गया कि बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में भाजपा के नेता अटल बिहारी बाजपेयी, मुरली मनोहर जोशी, लाल कृष्ण आडवाणी दोषी हैं।
  • 30 सितंबर 2010 को न्यायमूर्ति धर्मवीर शर्मा, न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल और इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति एसयू खान की तीन सदस्यीय न्यायाधीशों की पीठ ने राम मंदिर, अयोध्या विवाद शीर्षक सूट में अपना निर्णय दिया। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने विवादित भूमि को तीन भागों में विभाजित किया, जिसमें से एक एक भाग तीनों पक्षकारों (राम लला विराजमान, निर्मोही अखाडा और सुन्नी वक्फ बोर्ड) को दिया गया।
  • सभी पक्षों राम लला विराजमान, सुन्नी वक्फ बोर्ड और निर्मोही अखाड़ा ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में अपील की।
  • 9 मई 2011 को जस्टिस आफताब आलम और आरएम लोढ़ा की पीठ ने हिंदू और मुस्लिम दोनों संगठनों की अपील को स्वीकार करते हुए उच्च न्यायालय की लखनऊ बेंच के 2010 के फैसले पर रोक लगा दी और दोनों पक्षों को यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया।
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आखिर राम मंदिर – बाबरी मस्जिद अयोध्या भूमि विवाद में फैसले के घड़ी आ गई

8 जनवरी 2020 को SC ने अयोध्या टाइटल सूट की सुनवाई के लिए पांच जजों की बेंच गठित की। दो दिन बाद जस्टिस यूयू ललित ने खुद को पांच जजों की बेंच से अलग कर लिया। फरवरी में भारत के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने उनके अधीन पांच न्यायाधीशों की पीठ का गठन किया। इस पीठ में न्यायमूर्ति अशोक भूषण, न्यायमूर्ति नाज़ेर, न्यायमूर्ति बोबडे और न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ को शामिल किया गया था।

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने अदालत की निगरानी वाली मध्यस्थता का प्रस्ताव दिया। पूर्व न्यायाधीश एससी न्यायाधीश न्यायमूर्ति एफएम कलीफुल्ला, श्री श्री रविशंकर और वरिष्ठ अधिवक्ता श्रीराम पंचू मध्यस्थता पैनल में शामिल किए गए थे। 13 मार्च को फैजाबाद के अवध विश्वविद्यालय में मध्यस्थता शुरू हुई। सात दौर की चर्चा हुई लेकिन इसमें कोई परिणाम नहीं निकला। इसके बाद 2 अगस्त को अदालत ने फैसला सुनाते हुए कहा कि 6 अगस्त से राम मंदिर – बाबरी मस्जिद अयोध्या भूमि विवाद की नियमित सुनवाई की जाएगी।

शीर्ष अदालत ने मामले की सुनवाई 40 दिनों तक नियमित रूप से की और अंतिम 11 दिनों में सभी पक्षकारों को अपनी दलीलें पूरी करने के लिए अतिरिक्त एक घंटे का समय दिया गया। मामले में सभी पक्षों की दलीलें 16 अक्टूबर को पूरी हो गईं और फैसला सुरक्षित रख लिया गया।

9 नवम्बर 2020 को देश की शीर्ष अदालत ने अयोध्या विवाद (राम मंदिर – बाबरी मस्जिद विवाद) का अपना अंतिम फ़ैसला सुना दिया। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा की विवादित भूमि पर ASI को मिले सबूतों के आधार पर यह पूरी भूमि राम मंदिर निर्माण के लिए दी जाएगी। साथ ही बाबरी मस्जिद पक्षकारों को किसी अन्य जगह पर पाँच एकड़ भूमि मस्जिद बनाने के लिए दी जाएगी।

साथ सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को आदेश दिया की राम मंदिर निर्माण, देखरेख और प्रबंधन के लिए एक ट्रस्ट का गठन करे।

निष्कर्ष – राम मंदिर – बाबरी मस्जिद भूमि विवाद

देश के सबसे पुराने और उलझे हुए मामले राम मंदिर – बाबरी मस्जिद भूमि विवाद का अंत 9 नवम्बर 2020 को सुप्रीम कोर्ट के फैसले के साथ हो गया। इसके बाद कई पक्षकारों ने रिव्यू पिटिशन दायर की लेकिन जल्द ही उनको ख़ारिज कर दिया गया। सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिया गया फैसला अपने आप में महान था। क्योंकि कोर्ट ने मिले सबूत के आधार पर विवादित भूमि का फैसला हिंदुओं के पक्ष में दिया। लेकिन देश में भाईचारा बनाए रखने के लिए किसी दूसरी जगह पर पाँच एकड़ भूमि नई बाबरी मस्जिद बनाने के लिए देने के लिए सरकार को आदेश दिया।