गणेश जी की खीर वाली कहानी (Ganesh Ji ki Kheer Wali Kahani) : यह भगवान गणेश जी की एक बहुत प्रचलित कथा है, जो विशेष रूप से व्रत-उपवास के दौरान कही और सुनी जाती है. गणेश जी की खीर वाली कहानी को विनायक कथा के नाम से भी जाना जाता है। हिंदू धर्म में इस कथा का अपना अलग महत्व है।

Ganesh Ji ki Kheer Wali Kahani इंसानों को धर्म-कर्म की शिक्षा देने के साथ सबका सहयोग करने की प्रेरणा देती है। यहाँ पर गणेश जी की खीर वाली कहानी दी गई है जिससे आप हिंदू धर्म के धार्मिक मूल्यों को समझ सकते हैं। आइए जानते हैं Ganesh Ji ki Kheer Wali Kahani क्या है और इसका इतना महत्व क्यों है?

गणेश जी की खीर वाली कहानी (Ganesh Ji ki Kheer Wali Kahani)

एक बार भगवान गणेश जी ने पृथ्वी के इंसानों की परीक्षा लेने का निर्णय किया। भगवान गणेश एक छोटे बालक का रूप लेकर पृथ्वी पर भ्रमण करने लगे। उन्होंने अपने एक हाथ में एक चुटकी चावल लिया और दूसरे हाथ में एक चम्मच में दूध लेकर गली-गली घूमते हुए ज़ोर-ज़ोर से आवाज़ लगा रहे थे – ‘कोई मेरे लिए खीर बना दो, कोई मेरे लिए खीर बना दो….’। ऐसे ही आवाज़ लगाते हुए वो लगातार एक गांव के बाद दूसरे गांव की गलियों में चक्कर लगाते रहे लेकिन किसी ने उन पर ध्यान नही दिया, जो भी उन्हें देखता उन पर हँसता।

Ganesh Ji ki Kheer Wali Kahani
Ganesh Ji ki Kheer Wali Kahani

सुबह से कई गाँव की गलियों में घूमते-घूमते शाम ढलने लगी, लेकिन कोई भी उस बालक के लिए खीर बनाने को तैयार नही था। फिर भी बाल गणेश ‘कोई मेरे लिए खीर बना दो’ की आवाज़ लगाते हुए लगातार घूमते रहे।

एक गरीब बूढ़ी औरत शाम के वक्त अपनी झोपड़ी के बाहर बैठी हुई थी, तभी बाल गणेश ‘कोई मेरे लिए खीर बना दो..’ की आवाज़ लगाते हुए वहाँ पहुँचे। वह बूढ़ी औरत गरीब थी लेकिन उसका दिल बहुत कोमल था। उसके मन में सभी के लिए प्रेम और दया की भावना थी। जब उसने उस बालक को ‘कोई मेरी खीर बना दो..’ की आवाज़ लगाते देखा तो उससे कहा – बेटा! आओ मैं तुम्हारे लिए खीर बना देती हूँ।

तब बालक का रूप लिए गणेश जी ने कहा – ‘माता! खीर में लगने वाले चावल और दूध लेने के लिए बर्तन ले आइए। बूढ़ी औरत अपनी झोपड़ी में गई और 2 छोटी कटोरी लेकर बाहर आई। दो छोटी कटोरियों को देखकर गणेश जी ने कहा – माता अपने घर का सबसे बड़ा बर्तन लेकर आइए।

बूढ़ी औरत आश्चर्य में पड़ गई क्योंकि बाल गणेश के हाथ में सिर्फ़ एक चम्मच दूध और एक चुटकी चावल ही था, ये देख कर उसे थोड़ी झुँझलाहट भी हुई लेकिन उसने सोचा कोई बात नही छोटा बच्चा है इसकी बात मान लेती हूँ और फिर वो अपनी झोपड़ी में मौजूद सबसे बड़ा बर्तन जो एक पतीला था उसे लेकर बाहर आई।

बाल गणेश ने अपने चम्मच से दूध उस पतीले में डालना शुरू किया, तब बूढ़ी औरत आश्चर्यचकित रह गई। उसके सामने ही गणेश जी ने एक चम्मच दूध से पूरा पतीला भर दिया। उसके बाद वो एक के बाद एक पतीला और घर के सभी बर्तन लाती गई और गणेश जी सभी बर्तनों में दूध भरते चले गए। बाक़ी के कुछ बर्तनों में चावल और खीर बनाने में इस्तेमाल होने वाली दूसरी सामग्री भी गणेश जी ने भर दी। जब बूढ़ी औरत के घर के सभी बर्तन भर गए। तो गणेश जी ने उससे कहा – माता! मैं स्नान करके आता हूँ तुम खीर बना लो, मैं स्नान करके खाऊँगा।

उस बूढ़ी औरत ने गणेश जी से पूछा – ‘मैं इतनी ज़्यादा खीर का क्या करूँगी?’ तब बाल गणेश जी ने कहा – ‘गाँव के सभी लोगों को खीर खाने के लिए दावत दे दो’।

फिर बूढ़ी औरत ने बड़े प्रेम से पूरे सामग्री की खीर बना ली। खीर तैयार हो जाने के बाद वह गाँव के घर-घर जाकर सभी लोगों को खीर खाने का न्योता देने लगी। ये बात लोगों को समझ में नही आ रही थी की कैसे एक गरीब औरत जो भीख माँग कर जीती है आज पूरे गाँव को खीर खाने का न्योता दे रही है। गाँव के सभी लोग उसकी बात पर हँस रहे थे। लेकिन लोग कौतूहल बस खीर खाने के लिए उसके घर की ओर खिंचे चले आए। कुछ ही समय में पूरा गाँव बुढ़िया के घर के सामने इकट्ठा हो गया।

जब बूढ़ी औरत की बहु को खीर वाली दावत की जानकारी हुई तो वो भी वहाँ पहुँच गई। जब उसने खीर से भरे पतीलों को देखा तो उसके मुँह में पानी आ गया। खीर की मीठी-मीठी ख़ुशबू भी उसके मुँह में पानी ला रही थी। उसने एक कटोरी में खीर निकाली और दरवाज़े के पीछे बैठ कर खाने को तैयार हुई की उसके हाथ से खीर का एक छींटा गिर गया जिससे गणेश भगवान को भोग लग गया और वो तृप्त होकर प्रसन्न हो गए।

जब बूढ़ी औरत ने देखा की बालक आ गया है तो उसने कहा – बेटा खीर बन गई है, भोग लगा लो। इस पर गणेश जी बोले – माते! मैं भोग लगा चुका हूँ, अब आप खाओ और गाँव वालों को खिलाओ।

बालक की ये बात सुन कर औरत बोली – बेटा, खीर बहुत ज़्यादा है, इससे गाँव के सभी लोगों का पेट भर जाएगा उसके बाद भी ये बच जाएगी। बची खीर का फिर मैं क्या करूँगी? बूढ़ी औरत की ये बात सुनकर बाल गणेश बोले – माता! सभी के खाने के बाद जो खीर बच जाए, उसे रात को बर्तन में भरकर अपने घर के चारों कोनों में रख देना।

सभी के खाने के बाद जो खीर बची थी, बूढ़ी औरत ने बालक के बताए अनुसार रात को अपने घर के चारों कोनों में बड़े-बड़े बर्तन में भर कर रख दी। फिर बूढ़ी औरत सो गई और रात भी शांति से बीत गई। सुबह जब उसकी आँख खुली तो उसने देखा कि – उसके खीर वाले पतीलों में खीर की जगह सोना, हीरे, मोती, जवाहरात भरे हुए थे।

बूढ़ी औरत के आश्चर्य का ठिकाना ना रहा। वो बहुत खुश हुई और भगवान को शुक्रिया कहा। उसकी ग़रीबी अब दूर हो गई थी। सोने-चाँदी-हीरे-मोती को बेच कर बुढ़िया आराम से रहने लगी। उसने गणेश जी का एक भव्य और सुंदर मंदिर बनवाया और एक बड़ा सा कुंड भी बनवाया। इस तरह इस मंदिर की कीर्ति चारों तरफ़ फैलने लगी और बूढ़ी औरत और गणेश जी का मंदिर दूर-दूर तक प्रसिद्ध हो गया।

कुछ ही समय में उस मंदिर के पास धार्मिक आयोजन होने लगे। दूर-दूर से लोग उस मंदिर में भगवान गणेश जी की पूजा करने और मन्नतें माँगने के लिए आने लगे और गणेश जी भी किसी को निराश नही करते थे। सच्चे दिल से माँगी गई हर भक्त की मन्नतों को उन्होंने पूरा किया।

अब मैं भगवान गणेश जी की खीर वाली कहानी (Ganesh Ji ki Kheer Wali Kahani) का अंत करता हूँ। आशा करता हूँ की आपको ‘गणेश जी की खीर वाली कथा‘ पसंद आई होगी। गणेश जी और खीर की इस कहानी को अपने दोस्तों के साथ सोशल मीडिया जैसे – ‘फ़ेसबुक, WhatsApp Group, Telegram, Koo App’ इत्यादि में ज़रूर शेयर करें। अंत में मैं इतना ही कहूँगा की जिस तरह की कृपा भगवान गणेश जी ने बूढ़ी औरत के ऊपर की ऐसी कृपा हम सब पर करें और हमें सही राह दिखाएँ।

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