जानिए कैसे लद्दाख में सेना के साथ तैनात भारत की SFF (स्पेशल फ़्रंटियर फ़ोर्स) चीन के लिए बुरे सपने से कम नही है

चीन की सेना कई महीनों से लद्दाख में भारतीय सेना के सामने खड़ी हुई है, अब तो हालात ये हो गए हैं की युद्ध कब शुरू हो जाए कोई नही बता सकता। इसी बीच 30,31 अगस्त की रात को जब चीनी सेना ने फिर से दुस्साहस करने का प्रयास किया तो भारतीय सेना ने उसे पीछे हटने पर मजबूर कर दिया।

Indian special frontier force nightmare for china
Special Frontier Force - Pic Source : pixabay.com (Free for commercial use)

लेकिन कम लोगों को ही पता है की इस ऑपरेशन में भारतीय सेना की एक सीक्रेट फ़ोर्स भी लगी हुई है, भारत की इस सीक्रेट फ़ोर्स का नाम है Special Frontier Force - SFF यानी स्स्पेशल फ़्रंटियर फ़ोर्स। यह भारत की एक सीक्रेट सेना है, जिसका गठन 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद किया गया था।

इस स्पेशल सीक्रेट फ़ोर्स ने अपने गठन से लेकर आज तक कई ऑपरेशन किए हैं, जो सफल भी रहे हैं। उनमे से कुछ हैं - बांग्लादेश की मुक्ति, ऑपरेशन ब्लू स्टार, कारगिल युद्ध इत्यादि।

जब भी भारतीय सीमाओं को चुनौती दी जाती है, दुनिया ने कई बार भारतीय सेना की वीरता और पराक्रम को देखा है। सेना ने यह साबित कर दिया है कि भारत माता के वीर सपूत ऐसी चुनौतियों को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं करेंगे। स्पेशल फ्रंटियर फोर्स (SFF) सेना का अभिन्न अंग है। स्पेशल फ्रंटियर फोर्स ने हर मोर्चे पर अपनी ताकत दिखाई है।


इंडियन आर्मी इंटेलिजेंस बटालियन

30, 31 अगस्त की रात पैगोंग झील के दक्षिणी किनारे पर स्थित ठाकुंग और काला टॉप चोटियों पर भारतीय सेना के इस विशेष सीमा बल यानी SFF द्वारा कब्जा कर लिया गया था। चीनी को इस इलाक़े में हावी नहीं होने दिया गया और इस स्पेशल फ्रंटियर फोर्स की कार्रवाई की बदौलत भारत चीन से बेहतर पोज़ीशन पर पहुँच चुका है। एसएफएफ बहादुरी की ऐसी ही कई कहानियां हैं।

SFF भारतीय सेना की खुफिया बटालियन है। स्पेशल फ़्रंटियर फ़ोर्स (SFF) को चीनी सीमा में वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के कुछ प्रमुख उच्च ऊंचाई वाले मोर्चों के साथ उत्तराखंड से लद्दाख तक तैनात किया गया है।


स्पेशल फ्रंटियर फोर्स का गठन कैसे हुआ था ?

नवंबर 1962 में भारत-चीन सीमा युद्ध के बाद, इंटेलिजेंस ब्यूरो के निदेशक बीएन मुलिक ने कुछ तिब्बती सैनिकों की भर्ती करने का फैसला किया। उस समय तिब्बती गुरिल्ला आंदोलन सक्रिय था और कई सैनिक और कुछ अधिकारी पश्चिम बंगाल के कालिम्पोंग या दार्जिलिंग में थे। मलिक ने दलाई लामा के बड़े भाई ग्यालो थोंडुप से संपर्क बनाया।

अगले कुछ महीनों में उन्होंने 1959 के बाद भारत आने वाले तिब्बती शरणार्थियों की भर्ती की। उस समय उनके पास छह-सात हजार तिब्बती थे, जो तिब्बत वापस जाना चाहते थे और तिब्बत को चीनी कब्जे से मुक्त कराना चाहते थे। भर्तियों का एक समूह विभिन्न तिब्बती बस्तियों में गया और हर युवा तिब्बती को "तिब्बत के लिए लड़ने के लिए" प्रेरित किया, और उनको चीन के खिलाफ लड़ने के लिए तैयार किया था।

लेकिन तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति ने अमेरिकी हितों को ध्यान में रख भारत और इस फ़ोर्स को समर्थन देना बंद कर दिया था, जिससे कि उनका उद्देश्य कभी भी सफल नहीं हुआ।

तिब्बती सेनाओं ने कभी चीन के खिलाफ लड़ाई नहीं लड़ी। इस तरह 1962 के भारत-चीन युद्ध के तुरंत बाद स्पेशल फ्रंटियर फोर्स का गठन किया गया था। इसने केवल तिब्बतियों की भर्ती की और शुरू में इसे 22 बटालियन के रूप में जाना जाता था। इसे 22 बटालियन का नाम दिया गया था क्योंकि इसका गठन 22 माउंटेन रेजिमेंट के आर्टिलरी ऑफिसर मेजर जनरल सुजान सिंह उबान ने किया था और वह SFF के पहले महानिरीक्षक थे। अब SFF में तिब्बतियों के साथ-साथ गोरखाओं की भी भर्ती की जा रही है।


बटालियन कैबिनेट सचिवालय के अंतर्गत काम करता है

समय के साथ, स्पेशल फ्रंटियर फोर्स भारतीय सेना के अधीन हो गई और इसे विकास बटालियन का नाम दिया गया। यह बटालियन अब कैबिनेट सचिवालय के दायरे में आता है, जहां इसकी अध्यक्षता मेजर जनरल रैंक के एक सेना के महानिरीक्षक करते हैं। DGS अब भारत की बाहरी खुफिया एजेंसी RAW का हिस्सा है। SFF में शामिल इकाइयों को विकास बटालियन के रूप में जाना जाता है। पूर्व सेना प्रमुख जनरल दलबीर सिंह ने अपनी सेवा में रहते हुए एक बार इसका भी नेतृत्व किया था।


क्या SFF यूनिट्स आर्मी का हिस्सा हैं?

वास्तविकता यह है कि एसएफएफ इकाइयां सेना का हिस्सा नहीं हैं, लेकिन वे सेना के तहत कार्य करती हैं। इन इकाइयों की रैंक संरचनाएं भारतीय सेना के समान हैं और सेना के रैंक के बराबर हैं। बटालियन कर्मियों को इतना प्रशिक्षित किया जाता है कि वे विभिन्न प्रकार के कार्य कर सकते हैं जो एक 'स्पेशल फोर्स यूनिट' सामान्य रूप से करने में सक्षम है। इसलिए SFF इकाइयाँ अलग चार्टर और इतिहास होने के बावजूद परिचालन क्षेत्रों में किसी अन्य सेना इकाई के रूप में कार्य करती हैं। उनके पास अपना प्रशिक्षण संस्थान है, जहां विशेष बलों को प्रशिक्षित किया जाता है।

संयोग से, महिला सैनिक भी इन इकाइयों का हिस्सा बनती हैं और विशेष कार्य करती हैं। एसएफएफ इकाइयों ने कई गुप्त आपरेशनों में भी भाग लिया है। इनमें पाकिस्तान के साथ 1971 का युद्ध, स्वर्ण मंदिर अमृतसर में ऑपरेशन ब्लू स्टार, कारगिल संघर्ष और देश में आतंकवाद विरोधी अभियान शामिल हैं। इसके अलावा, जैसा कि आप जानते हैं यह एक सीक्रेट फ़ोर्स है इसलिए इसके कई अन्य कार्यों का खुलासा नहीं किया जाता है।


1971 के युद्ध में भी भारतीय सेना की मदद की थी

SFF की यूनिट ने 1971 में पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) के चटगाँव हिल में पाकिस्तानी सेना को बेअसर कर दिया था और भारतीय सेना को आगे बढ़ने में मदद की। इस ऑपरेशन का कोड नाम 'ऑपरेशन ईगल' था। बटालियन के सदस्यों ने दुश्मन के इलाकों में जाने का जोखिम उठाया और पाकिस्तानी सेना की संचार प्रणाली को नष्ट कर दिया। उन्होंने बर्मा (अब म्यांमार) में भाग रहे बांग्लादेश के पाकिस्तानी सेना के कर्मियों को रोकने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

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