जानिए क्यों और कैसे डूबी थी द्वारका ? द्वारका के समुद्र में डूबने का कारण, आज भी हैं द्वारका के अवशेष

जरासंध के मथुरा पर बार-बार आक्रमण से मथुरावासियों के जान-माल की सुरक्षा के लिए भगवान श्री कृष्ण ने मथुरा छोड़ दिया था। श्री कृष्ण ने स्वर्ग के शिल्पकार विश्कर्मा की मदद से समुद्र के तट पर मथुरावासियों के लिए एक नई नगरी बसाई थी, इस नगरी या शहर का नाम द्वारका (Dwarka) था।

समुद्र के तट पर स्थित श्री कृष्ण की द्वारका आज गुजरात की शान है, जिसको देखने के लिए हर साल देश-विदेश से लाखों तीर्थयात्री पहुँचते हैं।

Why and how was Dwarka immersed in the sea

द लॉस्ट सिटी ऑफ द्वारका (The Lost City of Dwarka)

कृष्ण द्वारा बसाई इस द्वारका नगरी का ज़्यादातर हिस्सा तो आज समुद्र में डूबा हुआ है। कई शोधों से कृष्ण की इस द्वारका नगरी के सबूत मिल चुके हैं।

शोधों से इस बात के पक्के सबूत मिल चुके हैं की इस डूबी नगरी द्वारका (द लॉस्ट सिटी ऑफ़ द्वारका) को भगवान श्री कृष्ण ने द्वापर युग में बनवाई थी। द्वापर में बनाई गई यह नगरी ऋषियों और कौरवों की माता गांधारी द्वारा दिए श्राप की वजह से खंडहर में तब्दील होकर समुद्र में डूब चुकी है।

आइए आपको बताते है की भगवान कृष्ण द्वारा बसाई नगरी द्वारका क्यों और कैसे डूबी थी समुद्र में। द्वारका कैसे डूबी थे ये जानने के लिए आपका ये जानना जरूरी है कि महाभारत युद्ध के बाद क्या हुआ था।

महाभारत के भीषण युद्ध के बाद क्या हुआ था

आप सबको पता ही होगा की महाभारत के युद्ध में पांडवों को विजय प्राप्त हुई थी। इसके बाद भगवान कृष्ण ने पांडवों के सबसे बड़े भाई युधिष्ठिर की ताशपोशी करके राजा बना दिया।

राजा बनाने के बाद श्रीकृष्ण गांधारी (कौरवों की माता) ने मिलने के लिए गए। इससे गांधारी बहुत दुःखी हुई और श्री कृष्ण को श्राप दे दिया कि - "जैसे तुम्हारी वजह से मेरे पूरे कुल का विनाश हुआ है, उसी तरह तुम्हारे पूरे वंश का विनाश हो जाएगा।"

अब यहाँ यह जानना जरूरी है की कृष्ण जब भगवान थे तो उन्होंने अपनी नगरी और द्वारकापूरी को बचाने के लिए क्यों कुछ नही किया ? इसके पीछे का कारण ये था की कृष्ण भगवान तो थे लेकिन उस समय वो इंसानी रूप में थे, इसी वजह से उन्होंने मनुष्य जीवन का सम्मान करने के लिए इस श्राप से मुक्त नही हुए थे। और इसके बाद श्री कृष्ण गांधारी को प्रणम करके वापस अपनी द्वारका नगरी चले गए।

ऋषियों ने श्राप क्यों दिया था

श्री कृष्ण के कुल को ऋषियों के श्राप के पीछे श्री कृष्ण के पुत्र सांब थे। एक बार सांब अपने दोस्तों के साथ खेल रहे थी, उसी समय कण्व ऋषि और महर्षि विश्वामित्र वहाँ से गुजर रहे थे। सांब ने जब इनको देखा तो वो इन ऋषियों का अपमान किया।

सांब के दोस्तों ने सांब को एक स्त्री के रूप में तैयार करके दोनों ऋषियों के सामने ले गए और उन्हें पूछे - "यह स्त्री गर्भवती है, बताइए की इसके गर्भ में क्या पल रहा है"।

सांब और उनके दोस्तों के द्वारा अपमान करने से दोनों ऋषि इतने क्रोधित हो गए की उन्होंने उनको श्राप दे दिए और कहा कि - "इसके गर्भ से मूसल पैदा होगा जिससे तू जैसे असभ्य और दुष्ट लोग अपने समस्त कुल का विनाश कर लेंगे"।

श्रीकृष्ण ने ऋषियों को मनाने का किया था प्रयास

सांब और उनके दोस्तों की करनी का पता जब श्रीकृष्ण को चला तो उन्होंने कहा ऋषियों के श्राप को बदला नही जा सकता। श्राप के अगले ही दिन सांब से मूसल उत्पन्न हुआ था।

राजा उग्रसेन ने सांब से उत्पन्न हुए इस मूसल को समुद्र में फेकवा दिया था। ऋषियों के श्राप के कारण श्रीकृष्ण ने पूरी द्वारका में मदिरा रखने और उसके सेवन पर प्रतिबंध लगा दिया था। क्योंकि श्रीकृष्ण चाहते थे की कोई भी नगरवासी मदिरा का सेवन करके अपने परिवार या दूसरे किसी को नुक़सान ना पहुँचाये। इसके पीछे का कारण ऋषियों का श्राप ही था क्योंकि उन्होंने सांब के साथ पूरी द्वारका को श्राप दिए थे, तो श्रीकृष्ण नही चाहते थे की कोई भी नगरवासी लड़ाई झगड़ा करके एक दूसरे का नाश ना कर दें।

श्रीकृष्ण ने यदुवंशी पुरुषों को तीर्थ पर भेज दिया

कहा जाता है की महाभारत युद्ध होने के लगभग 36वें साल में द्वारका में सब कुछ सही नही था, वह कई अपशकुन होने लगे थे। इसके बाद श्रीकृष्ण ने सभी पुरुषों को तीर्थ पर जाने के लिए कह दिए थे।

भगवान श्रीकृष्ण के आदेश को मान कर सभी पुरुष द्वारका छोड़ कर तीर्थ पर चले गए। तीर्थ पर जाते समय रास्ते में प्रभास आया। प्रभास एक स्थान का नाम है। जितने भी लोग तीर्थ पर गए थे प्रभास में सभी विश्राम कर रहे थे। लेकिन पता नही ऐसा क्या हो गया की सभी लोग आपस में ही लड़ाई कर बैठे।

उनकी यह लड़ाई मार-काट में पहुँच गयी थी। अब यही पर ऋषियों का श्राप असर दिखाना शुरू किया। कहते हैं सांब से जो मूसल उत्पन्न हुआ था उसी की वजह से प्रभास की एरका घास में प्रभाव पड़ा था और जो भी इंसान उस एरका घास को लड़ाई के समय उखाड़ता था, तो वो मूसल में बदल जाती थी।

अब जबकि सभी द्वारकावासी आपस में लड़ाई कर रहे थे तो इस घास को जैसे ही उखाड़ते तो वह मूसल बन जाती थी। एक ऐसा मूसल जिसके एक प्रहार से ही किसी की भी जान चली जाए। आपस में हुई इस लड़ाई में ज़्यादातर द्वारकावासी मारे जा चुके थी, इसमें प्रद्युम्न जो की श्रीकृष्ण के पुत्र थे उनकी भी मृत्यु हो गई थी।

जब श्रीकृष्ण को इस बारे में जानकारी मिली

जैसे ही श्रीकृष्ण को इस लड़ाई के बारे में पता चला तो तुरंत प्रभास गए। वहाँ द्वारकावासियों को और अपने पुत्र को मृत देखकर वो ग़ुस्से में वहाँ की घास को उखाड़ लिए, जैसे ही श्रीकृष्ण उस एरका घास को उखाड़े वो मूसल में बदल गई। लड़ाई में जितने भी बचे हुए थे, श्रीकृष्ण में क्रोध में उन सभी का वध उसी मूसल से कर दिया।

कहते हैं अंत में सिर्फ़ श्रीकृष्ण, बलराम और उनका सारथी बचा हुआ था। इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण ने अपने सारथी दारुक को यह कह कर हस्तिनापुर भेज दिया की - "जाकर अर्जुन को बुला लाओ"।

इसके बाद श्रीकृष्ण ने बलराम को वही रुकने के लिए बोल कर इस लड़ाई और वध के बारे में अपने माता-पिता को जानकारी देने के लिए द्वारका चले गए। श्रीकृष्ण ने इसकी पूरी सूचना अपने पिता वासुदेव जी की दी और कहा कि अर्जुन जल्द ही यहाँ आने वाला है आप नगर में बचे सभी बच्चों और स्त्रियों को लेकर उसके साथ हस्तिनापुर चले जाना।

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बलराम का वापस अपने बैकुंठ जाना - बलराम की मृत्यु

श्रीकृष्ण इस नरसंहार की सूचना देकर जब वापस प्रभास आए तो उस समय बलराम ध्यानमग्न थे। श्रीकृष्ण के आते ही बलराम अपने शेषनाग अवतार में आकर समुद्र में चले गए।

श्री कृष्ण  की मृत्यु

इसके बाद श्रीकृष्ण विचरण करते हुए ऋषियों और गांधारी के श्राप के बारे में विचार करते हुए एक पेड़ के नीचे जाकर बैठ गए। जब श्रीकृष्ण पेड़ की छांव में बैठे थे उसी समय जरा नाम के शिकारी का चलाया बाण उनके पैर में आकर लग गया।

शिकारी जब श्रीकृष्ण को देखा तो उनसे क्षमा माँगा। श्रीकृष्ण ने उस शिकारी को क्षमादान देकर अपने मानव शरीर को त्याग कर वापस अपने बैकुंठधाम चले गए।

द्वारका समुद्र में डूब गई

इसके बाद अर्जुन द्वारका गए और वसुदेब जी को कहा की आप सभी द्वारकावासियों को लेकर हस्तिनापुर जाने की तैयारी का आदेश दीजिए। इसके बाद अर्जुन प्रभास जाकर सभी का अंतिम संस्कार किए और वापस द्वारका आ गए।

द्वारका में अगले दिन वासुदेव जी ने भी इस संसार को अलविदा कह दिया। फिर अर्जुन उनका भी अंतिम संस्कार करके द्वारका में बचे सभी लोगों को लेकर हस्तिनापुर चले गए।

नगरवासियों के हस्तिनापुर छोड़ने के बाद द्वारका समुद्र में समा गई। इसी डूबी हुई द्वारका नगरी के अवशेष आज समुद्र में है और कई खोजों से यह सिध्द हो चुका है की यही भगवान श्रीकृष्ण की द्वारका नगरी थी।

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