अंकोरवाट मंदिर दुनिया का प्राचीन हिंदू मंदिर जिसके बारे में भारतीय नही जानते - Angkor Wat Temple

हमारा देश भारत अपने आप में बसी संस्कृति और धार्मिक विरासत के लिए दुनिया भर में विख्यात है। हमारे देश में कई ऐसे मंदिर हैं जिनकी शोभा देखने के लिए देश और विदेश से लाखों दर्शनार्थी और श्रद्धालु आते हैं। और यहां के मंदिरों की शोभा देख मंत्रमुग्ध हो जाते हैं।

Angkor Wat Temple is the ancient temple of the world, Angkor Wat mandir


लेकिन दोस्तों यदि आप से पूछा जाए कि दुनिया में सबसे बड़ा हिंदू मंदिर कहां पर है? तो आप भारत के ही किसी बड़े मंदिर का नाम लेंगे। लेकिन आपको शायद यह जानकर आश्चर्य होगा कि विश्व का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर भारत में नहीं बल्कि भारत से 4933 किलोमीटर की दूरी पर कंबोडिया में स्थित है। इस मंदिर का नाम अंकोरवाट मंदिर है।

यह मंदिर 402 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है। यह मंदिर मुख्य रूप से भगवान विष्णु को समर्पित  मंदिर है। जो धीरे धीरे 12वीं शताब्दी के अंत तक बौध्द मंदिर में बदल दिया गया था। इसका निर्माण खमेर साम्राज्य में हुआ था।

अंगकोरवाट मंदिर (Angkor Wat Temple) कम्बोडिया के अंकोर में स्थित है। इस शहर का पुराना नाम यशोधर पुर था। इस शहर का निर्माण महाराजा सूर्यवर्मन तृतीय के शासनकाल के दौरान हुआ था। यहाँ के इतिहास को देखें तो बेहद दिलचस्प जानकारी सामने आती है।

9वीं शताब्दी ईस्वी में जय वर्मा तृतीय कंबुज का राजा हुआ और उसी ने अंकोरथोम नामक अपनी राजधानी की नींव डाली। उस वक्त अंकोरथोम को यशोधर पुर के नाम से जाना जाता था। राजधानी लगभग 40 वर्षों तक बनती रही और 900 ईसवी के लगभग तैयार हुई।

यह अपने समय में संसार के महानगरों में गिना जाता था और इसका विशाल भव्य मंदिर अंकोरवाट के नाम से आज भी विख्यात है।

इस मंदिर का निर्माण 1112 में कंबुज के राजा सूर्यवर्मन तृतीय के शासन काल में हुआ था। परंतु वो इसे पूर्ण नही कर सके। अंगकोरवाट के निर्माता सूर्यवर्मन तृतीय ने निर्माण कार्य में इतना ज्यादा धन खर्च कर दिया था कि उनका देश कंगाली की स्थिति में पहुंच गया था।

इसका परिणाम यह हुआ कि 1150 से 1181 तक देश में ना तो किसी मंदिर का निर्माण हुआ और ना ही कोई शिलालेख लिखा गया। इसके बाद मंदिर का कार्य उनके भांजे एवं उत्तराधिकारी धरनेंद्र वर्मन के शासनकाल में संपूर्ण हुआ।

वर्ष 1431 में सियामी हमले के दौरान कंबोडिया में हजारों देवी-देवताओं की मूर्तियां, मंदिर और कलाकृतियों के लिए खतरा पैदा हो गया। सभी ने इन्हें लावारिस छोड़ दिया। राजधानी पर हमले की मुश्किल घड़ी में कंबोडिया के लोगों का बर्ताव हैरान कर देने वाला था।

हमला होते ही लोग राजधानी छोड़ कर चले गए किसी ने भी अपनी राजधानी को बचाने की जरा सी भी कोशिश नहीं की। जिसके चलते यहां बौद्ध धर्म से जुड़े लोगों का शासन स्थापित हो गया और मंदिरों को बौद्ध रूप दे दिया गया।

16वीं शताब्दी के आगमन से पहले ही अंगकोरवाट का सुनहरा अध्याय लगभग समाप्त हो गया और बहुत से प्राचीन मंदिर खंडहर में तब्दील हो गए। इसी दौरान अंगकोरवाट की संरचना और बनावट को भी कई प्रकार के परिवर्तनों से गुजरना पड़ा।

फिर धीरे-धीरे पास के वनों की बाढ़ ने इस नगर को दुनिया की नज़रों से गायब कर दिया और उसकी सत्ता अंधकार में विलीन हो गई। नगर का ज़्यादातर हिस्सा भी टूट कर खंडहर हो गया।

इतिहास पर नजर डाली जाए तो इस मंदिर का इतिहास बौद्ध और हिंदू दोनों ही धर्मों से जुड़ा है। करीब 27 शासकों ने कम्बो देश पर राज किया जिनमें से कुछ शासक हिंदू और कुछ बौद्ध थे। यही वजह है कि कंबोडिया में हिंदू और बौध्द दोनों धर्मों से ही जुड़ी मूर्तियां मिलती है।

19वीं शताब्दी के मध्य में एक फ़्रांसीसी पुरातत्ववेद और प्राकृतिक विज्ञानी हेनरी की नजर इस पर पड़ी तो उन्होंने एक बार फिर दुनिया के गुमशुदा, बेशकीमती और आलीशान मंदिर को खोज निकाला।

यह मंदिर 402 एकड़ में फैला है। जिसकी रक्षा भी इसके चारों ओर फैली खाई करती है। जो लगभग 700 फीट गहरी है और यह खाई सदा जल से भरी रहती है। मंदिर के पश्चिम की ओर इस खाई को पार करने के लिए एक पुल बना हुआ है। पुल को पार करते ही मंदिर में प्रवेश के लिए एक विशाल द्वार बना हुआ है, जो लगभग 1000 फुट चौड़ा है।

मिस्र के पिरामिड की तरह यहाँ सीढ़ी को ऊपर की उठता हुआ बनाया गया है। अंगकोरवाट मंदिर का मूल शिखर लगभग 64 मीटर ऊंचा है।

इसके अतिरिक्त अन्य सभी आठों शिखर 54 मीटर ऊंचे हैं। अंगकोरवाट मंदिर साढ़े 3 किलोमीटर लंबी पत्थर की दीवार से घिरा हुआ है। उसके बाहर 30 मीटर खुली भूमि और फिर बाहर 190 मीटर चौड़ी खाई है।

नगर के ठीक बीचों-बीच शिव का एक विशाल मंदिर हैं। इसके तीन भाग हैं। प्रत्येक भाग में एक ऊंचा शिखर है। मध्य शिखर की ऊंचाई लगभग 150 फीट है। इस ऊँचे शिखर के चारों ओर अनेक छोटे-छोटे शिखर बने हैं। जिनकी संख्या लगभग 50 के आसपास है।

मंदिर की विशालता और निर्माण कला आश्चर्यजनक है। भारतीय धर्म ग्रंथों के लिहाज से देखें तो इसका बेहद खास महत्व है। यह विष्णु मंदिर मेरु पर्वत का प्रतीक है। इसकी दीवारों में पूरी रामायण मूर्तियों के रूप में अंकित की गई है। साथ ही भारतीय धर्म ग्रंथों के सभी प्रसंगों का सजीव चित्रण किया गया है।

जैसे असुरों और देवताओं के बीच समुद्र मंथन का दृश्य भी दिखाया गया है। जिसे देखने से हमें पता चलता है कि विदेशी में जाकर भी भारतीय कलाकारों ने अपनी कला को जीवित रखा था।

इस मंदिर का जुड़ाव भारतीय हिंदू संस्कृति से है। इसलिए कहा जाता है की यह मंदिर एक ही दिन में अलौकिक शक्तियों के माध्यम से बना था। आधुनिक कंबोडिया में ही लगभग 450 हिंदू स्मारक हैं, जिन पर सरकार का अधिकार है। लेकिन राष्ट्र के लिए सम्मान के प्रतीक के रूप में अंकोरवाट मंदिर को ही कंबोडिया के राष्ट्रध्वज में स्थान दिया गया है।

विश्व के सबसे लोकप्रिय पर्यटन स्थलों में से एक होने के साथ ही अंगकोरवाट मंदिर यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थलों में से एक है। पर्यटक यहां केवल वास्तु शास्त्र का अनुपम सौंदर्य देखने ही नहीं आते बल्कि यहाँ का सूर्योदय और सूर्यास्त देखने भी आते हैं।

कंबोडिया इतिहास के पन्नों को पलटती यह अंगकोरवाट मंदिर एक ऐसी अद्भुत कड़ी है, जो हिंदुस्तान की धार्मिक और सांस्कृतिक जड़ों का भी विस्तार बताती है। इसका प्राकृतिक सौंदर्य इतना अतुल्य है कि दुनिया के प्राचीन ऐतिहासिक धरोहरों में अंगकोरवाट मंदिर को सातवां स्थान प्राप्त है।

अंगकोरवाट प्राचीन मंदिर का इतिहास - History of Angkor Wat Temple


अंगकोरवाट मंदिर का निर्माण लगभग 1113 और 1150 के बीच हुआ था। यह लगभग 400 एकड़ के क्षेत्र में फैला हुआ मंदिर है। अंगकोर वाट अब तक निर्मित सबसे बड़े हिंदू धार्मिक स्मारकों में से एक है। इसका शहर का नाम भी "मंदिर शहर यानी Temple City" है।

मूल रूप से भगवान विष्णु को समर्पित यह एक हिंदू मंदिर के रूप में बनाया गया था। इसे 14वीं शताब्दी में बौद्ध मंदिर में बदल दिया गया था और बुद्ध की मूर्तियों को पहले से ही समृद्ध कलाकृति से जोड़ दिया गया था। कुछ समय बाद इसे सैन्य किलेबंदी में बदल दिया गया। आज यह यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल है, जिसे वैज्ञानिक संरक्षित करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

इसकी 213 फुट ऊंची (65 मीटर) केंद्रीय मीनार चार छोटे टॉवरों से घिरी हुई है। इसमें एक माउंट मेरु की छवि को पुनर्जीवित करता है, जो हिंदू पौराणिक कथाओं में एक पौराणिक स्थान है जो हिमालय में स्थित है और हिंदू देवताओं का निवास स्थान है।

अंगकोरवाट मंदिर दुनिया के सबसे बड़े शहर में स्थित है


शहर जहां मंदिर का निर्माण किया गया था। अंगकोर, आधुनिक कंबोडिया में स्थित है और कभी खमेर साम्राज्य की राजधानी थी। इस शहर में सैकड़ों मंदिर हैं। जनसंख्या 1 मिलियन से अधिक है। यह शहर औद्योगिक क्रांति तक दुनिया का सबसे बड़ा शहर था।

लिडार (lidar) के अनुसंधान से पता चला की अंगकोर के शहरी इलाक़े में उस समय 500,000 से अधिक निवासी रहते थे। इसके साथ महेंद्रपर्वत नामक एक खोए हुए शहर की भी पहचान की गई थी, जो अंगोर वाट के उत्तर में लगभग 25 मील (40 किलोमीटर) की दूरी पर स्थित है।

मंदिर में एक खाई, कई टावर, सापों की संरचना और छिपी हुई पेंटिंग हैं


अंगकोर वाट अपने आप में 650 फीट चौड़ी (200 मीटर) की खाई से घिरा है। जिसमें 3 मील (5 किमी) से अधिक की परिधि शामिल है। यह खाई 13 फीट (4 मीटर) गहरी है। यह भूजल के बहुत अधिक बढ़ने या बहुत कम होने से रोकता है। जिससे इस मंदिर की नींव को स्थिर करने में मदद मिलती है।

अंगकोर वाट का मुख्य प्रवेश द्वार पश्चिम में एक पत्थर का मार्ग था। इसमें संरक्षक शेर रास्ता दिखाते थे। हाल ही में, पुरातत्वविदों को पश्चिमी गेट पर बलुआ पत्थर और लेटराइट से बने आठ मीनारों के अवशेष मिले। ये टॉवर उन तीर्थस्थलों के अवशेष हो सकते हैं जो अंगकोर वाट के पूर्ण रूप से निर्मित होने से पहले उपयोग में थे। मंदिर के पूर्व में एक दूसरा अधिक बड़ा प्रवेश द्वार था।

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